संरक्षित: World (Hindi poem)

स्टिकी

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  • दिनांक मार्च 30, 2014
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अपनी बात

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आज कई महीनों बाद ब्लाग खोला सोचा देख लूँ कहीं भूल तो नही हुई!आजकल ट्विटर पर उपस्थित जरुर रहता हूँ! कल बातों हीं बातों में डॉ साहब ने बताया अमेरिका के लोग अच्छे हैं! पड़ोस से मतलब नही सब अपने अपने कामो में लगे हैं! 2014 से हम भी आप सब से जुड़े और आजतक भूले नही ! मेरी पहचान जितनी भी है उसमें भगवत कृपा अमेरिका का यह वर्डप्रेस तथा भारत के प्रधानमन्त्री जी के सत्ता में आने पर ट्विटर पर रुझान बढ़ा इसलिए वहां जरुर रहता!
विश्व के घ्त्नाक्र्मो पर मेरी भी निगाह है!उत्तरकोरिया की हलचल काफी चिंताजनक है पर होनी को जो मंजूर ऐसा हम भारतीय तो ऐसा मानते हैं!परमात्मा आप सबको खुशहाल रखे नीरोग रखे अपनी शुभ कामनाओं के साथ ! समय आने पर नियमित लिखूंगा अभी मुश्किल हैं!

अपने मन की बात

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मित्रों ! आज काफी दिनों बाद वर्ड प्रेस के अपने खाते को खोला थोड़ी असुविधा तो हुई |पासवर्ड याद नही पर प्रबन्धन अच्छा है तुरंत सुविधा मिली और फिर खाता खोला थोड़ी देर बिछड़े यार को निहारा फिर सोचा अपने मन की बात लिख दूँ जब कोई पढ़े तो समझे रमेश यायावर भूलता नही | पर आजकल ट्विटर पर मिलता हूँ रोज मिलता हूँ दिन भर मिलता हूँ पता वही @rameshagrawal95 !

कवि दर्शन

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कवि दर्शन
बरसों पहले कवि दर्शन की ईच्छा हुई
मैंने सोचा आखिर कवि दीखता कैसा होगा
और खुद की आँखों से वह ओरों को देखता होगा
अपने मुंह से बोलता होगा और कानो से सुनता होगा
परिधानों की कल्पना थी कुर्ता धोती और झोला
मैंने अपने मन को टटोला और हिम्मत बटोर कर
गया कवि दर्शन को पैतीस किलोमीटर दूर शहर में
मन में उमड़ते घुमड़ते भाव कहीं कवि राज को आ गया ताव
तो अपनी तो गई पर उसकी भी नही बचेगी
और फिर मोटरवाहन से चलकर आ हीं गया पड़ाव
पहुंचा शहर में कवि के गाँव, कवि महाशय कहीं गए थे
किसी ने पूछा किससे काम है क्या काम है
दोनों हीं प्रश्न हैरान करने वाले थे ?
किस से काम है शब्दावली थोड़ी अटपटी लगी
और क्या काम है यह और भी बड़ा काम है !
यह कविराज का क्या यही है डोर पर अद्भुत है शोर
भाड़ेदारों की जमी थी जमात सबकी अपने दुःख दर्द की बात
कवि मिले तो कहे कविता सुनाएं मैंने सोचा यह कहाँ हम आए
थक हार कर मैंने पुस्तक थमाई कुछ देर में चेहरे पर मुस्कुराहट आई
और फिर भोजोपरांत फिर एक बार फिर हुआ दुआ सलाम
वापस दौड़ा आया अपने हम गाम फिर कभी जाने की ईच्छा न जगी
मैं और मेरी कविता थी सगी अब जमाने का कोई खौफ नही
मुझे कोई खा जाए मैं अजवाईन या सौंफ नही
इस प्रकार कवि दर्शन को हुए एक दशक
मुझे कवि और कविता का हुआ था शक !!

वाराणसी दर्शन (यात्रा वृतांत)

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वाराणसी दर्शन (यात्रा वृतांत)
बीते दिनों बनारस जिसे वाराणसी या शिवपुरी काशी कहा जाता है मुझे अपने परिजनों के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | बाबा भोले नाथ की कृपा हुई माँ गंगा स्नान दर्शन और द्वादश ज्योतिर्मय काशी विश्वनाथ शिव लिंग पूजन कर पाया | काशी जाना यूँ तो पहली बार नही हुआ परन्तु 25 बरसों बाद ही काशी पुरी गया था | वहां मेरी ममेरी बहन को मेरे आगमन की सूचना थी साथ बहन के ससुराल पहली बार जाना भी नसीब हो रहा था अनुमान तो लग हीं सकता है बहन ने कितनी खातिरदारी की होगी और मुख्य स्थलों तक वह स्वयं भी घूमी ! वाराणसी के बारे में बरसों पहले सुना रांड सांड सीढ़ी सन्यासी इनसे बचे तो बसे काशी ! पुरानी बातें हैं आप अच्छे तो देश अच्छा आप बुरे तो देश बुरा बनारस जाएँ या कहीं और मंशा अपनी जांचे परखे |
बनारस आगमन के साथ हीं चार पहिया वाहन तैयार खड़ा था ट्रेन से उतरते हीं बहन के घर ले उड़ा | वहां सुंदर एक भांजी भी दिखी जो नवागन्तुक मामा मामी नानी से मिलकर बेहद खुश थी और उसने वनारस घुमने की बात पूछी कहाँ कहाँ जाना है ,मैंने तीन स्थान बताए पहला मोदी घाट जिसे भले हीं सारा जगत अस्सी घाट के नाम से जानता हो पर इसकी पहचान अब मोदी घाट के रूप में हुई ऐसा मैं मानता हूँ | अस्सी घाट तो तीन बार 25/30 बरस पूर्व में भी गया हूँ तब और अब आसमान धरती का अंतर है | अस्सी घाट वास्तव में अब सबसे सुंदर और अलबेला घाट है मुझे अस्सी घाट जाकर बेहद अच्छा लगा ! दुसरा गंगा स्नान द्शास्व्मेघ घाट मुख्य घाट और तीसरा काशी विश्वनाथ के दर्शन पूजन अन्य जो उपयुक्त हो सरल हो | बातों हीं बातों में वाराणसी की नामी चाट का जिक्र भी आया हमलोग जल्द ही स्नान कर तैयार हुए फिर हमारी सवारी ने अस्सी घाट के लिए उडान भरी ! गंगा का अद्भुत नजारा और घाट की सम्पूर्ण सफाई तथा प्रबंध देखकर मन फुला नही समा रहा था जैसे भगवान श्री राम का यहाँ आगमन हुआ हो ! दो दो सेल्फी जो मोदी सरकार की हीं देन है यादों में बसे अस्सी इसलिए फोटो सूट हुआ | फिर न्यू काशी विश्वनाथ काशी हिन्दू विश्व विधालय परिसर में दर्शनार्थ हम सब निकले |
बेहद आकर्षक दर्शन और खूबसूरती से मन्दिर परिसर का निर्माण हुआ यहाँ दर्शन यथा साध्य पूजा की फिर परिसर के चक्कर मार अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाओ के दर्शन किये ! अब संकटमोचं हनुमान मन्दिर की बारी थी चार सो साल इस पुराने मन्दिर के बारे में चर्चा है बाबा तुलसी ने मन्दिर विग्रह की स्थापना की और यहाँ बंदरो का झुण्ड विराजमान होता | आरती का वक्त था हम सब शरीक हुए पूर्व में भी मैं यहाँ आया था फिर त्रिदेव मन्दिर देखा जो अग्र समाज द्वारा स्थापित है सुंदर साज सज्जा नक्काशी मन की प्रसन्नता तो ईश्वर के प्रबंध से खुश थी फिर दुसरे दिन माँ गंगा दर्शन स्नान पूजन बाबा विश्वनाथ की गली से मन्दिर में दर्शन आधे घंटे में ही हुए दोपहर में दुर्गा मन्दिर भी गया सायं काल मुगल सराय तक गाड़ी छोड़ने हमें आई !
बना रस जैसे मन का उद्बोधन हो बनारस मैं आ गया भोले नाथ आपने बुलाया तब की काशी अब की काशी शहरीकरण की और दौडती हमारी काशी ,कभी तीन सो साठ घाट गंगा किनारे होने की चर्चा थी सारे घाट मैंने तो चलकर पूर्व में दर्शन किये थे एक हनुमान घाट जाने की मंशा था वह भी पुरी हुई दक्षिण मुखी हनुमान जी का बड़ा सा विग्रह बेहद आकर्षक और पूजनीय रहा !
वाराणसी संसदीय क्षेत्र अब तो देश के प्रधानमन्त्री जी का संसदीय क्षेत्र है देश के विकास का पैमाना बनारस देखकर तय किया जा सकता है लाख चाहने पर भी भ्रष्टाचार रूपी जड़ का समूल नाश करने में आज भी देश असमर्थ है ! प्रधानमन्त्री जी का मिनी कार्यालय भी दिखा पर कोई चहल कदमी नही दिखी मुझे लगा यहाँ भी समर्पण की कमी है शायद नव निर्माण में शिकायतें मिली सड़क जाम आदि की भी शिकायते हैं ! डिवाइडर की चौड़ाई खाह मखाह सड़को को संकरी करती हैं इसे कम चोडा रखा जाना चाहिए !अवाम की आस्था कभी कम ना होगी इसी आशा के साथ घूम आया रमेश यायावर बनारस !
रमेश अग्रवाल !

दस रूपये का इन्टरनेट (कविता)

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दस रूपये का इन्टरनेट (कविता)
एयरटेल मोबाईल कम्पनी से
मैंने कहा दस रूपये का
इन्टरनेट रोज दो मुझे
तुम कोई अकेले सेवा
प्रदाता नही हो धरा पर !
पर तुमने सुना हीं नही
तुम्हें गरीबों को लुटने का
चस्का लगा है तुम देखते नही
तीन सो रूपये माह स्वेच्छा से
देता रहा तुमने दो सो पांच से
तीन सो पनचानबे रूपये का प्लान बदला
अब तुम चार सो पनचानबे खोज रहे
और तुम्हारा जुड़वां बी एस एन एल
मुझसे एक हजार रूपये लगभग
हर माह भूगतान लेता |
गरीब कमाता क्या खाता क्या
तुम्हारी ज्यादती का शिकार मैं नही होऊंगा
अब एम् एन पी से बदलाव कर डालूँगा
सेवा के नाम पर ज्यादती तुम्हारी नही चलेगी
एक जी बी नही भरा सकते आपका ऑफर
यह कम्पनियां गरीबों का खून चूसने में लगी
जिस पर सरकार की निगाह भी नही !!
रमेश यायावर !

उम्मीद

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उम्मीद
तुमने अपनी उम्मीदों पर उतारा मुझे
तुम मुझे छोड़ कर जाओगे किस तरह
तुम्हें मेरे आगे आगे भागे भागे
चलना हीं होगा
तुम्हारी उम्मीदों की सड़क
बड़ी लम्बी है |
विश्व मंच पर शांति का प्रयास
वह भी इक्कीसवीं सदी में
तब एक रावण एक राम था
और अब राम का तो पता नही
रावण लाखों है
तुमने हनुमान से मिलाया भी नही
ये बंजरों की धरती की तरह
कब तक पीटोगे मुझे
शरीर में जबरन खुश जाते हो
फिर कलाबाजी दिख लाते हो
ना चलो तो क्यों बनाया डेरा
मेरा रुकना कठिन मेरा चलना कठिन
तुम्हारी हलचले तुम्हें ले डूबेगी मेरा क्या ?
भारत से मैं रमेश यायावर !