एहसास

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एहसास (हिन्दीकविता)

तुम्हारे होने का मुझे एहसास है

फिर तुम मुझे साथ होने का

एहसास कराते हो

ताकि मैं मुरझा ना जाऊं

कहीं बिखर ना जाऊं

तुम दवाओ में कहीं

कहीं दुआओं में

जल में थल में

नभचर में जलचर में

साहित्य में कविताओं में

कहानीयों में धर्म ग्रंथो में

प्रेरक बनकर उभरते |

तुम्हें खुद हीं ले जाना है उस पार

तुम्हीं तो हो काया खेवनहार

तुम्हारा दिनरात बढ़ता है प्यार

जब सब सो जाते तब तुम आते

अपना प्यार जताते राह बताते !

तरह तरह की प्रेरणा देते

मुझे भी उलहना देते

मैं भी राह पूछता

वह बात पूछता

मुझे क्या क्या करना है

जमाने से नही डरना है

हे परवर दीगार इतना मत कर प्यार

मैं तुम्हें उलहना दूँ और तुम सुनो

सुनकर चुप रहो फिर चुप करो

यह मन ज्ञान की गंगा है

इसके निकलते हीं हर मानव यहाँ पर नंगा है

हर एहसास तले एक दीया एक हीं बाती

तन तेल से नित्य हो रही प्रभाती ||

रमेश यायावर 21-01-2016

जमाना

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जमाना (हिन्दीकविता)

मुश्किलों में जमाना

मुश्किलों में खजाना

बात बात में कुरेदते जज्बात

ये कैसी गोलीयों की बरसात

आज भी पाकिस्तान दहला

आतंकवाद से मानव मन ना बहला

यह तुम्हें ही डसेगा

फिर कहाँ तू बसेगा ?

खोखली बातो से

स्याह सी रातों से

कोई नही बचा

तेरा भरोसा किसी को नही जंचा

तेरा खैर मकदम तू भी नही

रही सही आखों से धार बहे

जमाने से तेरा प्यार कहे

तूने क्या किया और तू क्या करेगा

दुनियां को मारेगा तो खुद भी मरेगा

132 बच्चो का कत्ल तुम भूल गए

फ़्रांस का हमला भूल गये

आए दिन कि हलचलों को भूल गए

दुनियां मिटाने की चाह में तुं खुद मिट जाएगा

और जमाने में फिर क्या पाएगा-

बंजर या खोखली काली स्याह सी जमीन

जमाने में खाएगा दाना बिन बिन

जमाना अब भी संभल

फिर परमपिता देंगे अदभुत बल |

रमेश यायावर 20-01-2016

एक अदद चाय

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एक अदद चाय (हिन्दीकविता)

एक अदद चाय ने

आज ने सिर फोड़ा

जमाना काला है या गोरा

सोचने को विवश हुआ

मैं पैदल था, आज बस हुआ

वर्ड प्रेस की छपी एक कविता

से मैंने भी लिखने की ठानी

नही लिखूं तो होगी बईमानी

पहरावे को देखकर हर कोई था दंग

देखता कोई और भी है क्या संग

ये चाय की केतली उठाए

चौराहे पर खडी ,क्या कब कहाँ हुई बड़ी

किसी को चाय पीने में संकोच

किसी की बदल रही थी सोच

निहारता हर कोई तालाब में फूल खिले

कब कैसे इससे मिले ?

सबकी नजरे बस पहचान रही थी

ये कौन कहाँ की खान रही है

कुछ कसर लिबास ने छोडी

कुछ कदम ताल से थी गोरी !

चाय पीने से बढ़ेगा चाय का नशा

अब मानव मानवता में कहाँ बसा ?

घूरती निगाहों में बस केतली और चाय

देखता था आदम जात कितनी होगी आय

ये कहे घर ले चलूं और घर ले जाकर इसे छ्लूं !

रमेश यायावर 20-01-2016 ( वर्ड प्रेस की छपी कविता और चित्र देखकर निकला काब्य )

पहचान

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पहचान – (हिन्दीकविता)

देखा है मैंने किस कदर बच्चे

मेरी आँखों के सामने जवान हुए

और जवान, अवस्था पार कर बुड्ढे हुए

पर ,क्या पहचान है आज तक तुम्हारी

बाल काले थे सफेद हुए

जिन्दगी की भागम भाग में

तुमने सफेद बालो को आवरण चढ़ा कर

फिर काला, सुनहरा किया

और अपनी ढलती ऊम्र की पहचान छिपाई

वक्त को तुमने नही पहचाना

ये मैंने क्या बनिये की दुकान खोली

यह मेरे साधना क्षेत्र का इतिहास है

मैने किस कदर लिखना सीखा

और अपने पाप पूण्य के साथ साथ

तुम्हारे पाप पूण्य का हिसाब रखा

जो मैंने देखा समझा गुणनफल के हिसाब से

पाप का फल एक नया पाप

और पूण्य का फल एक नया पूण्य

यह जमाने की तरह हिसाब है

और हर दिन को समय सारणीबद्ध जीया

साथ हीं अपनी ऊम्र से एक दिन घटाया

ताकि मुझे पता हो मुझे कब जाना है –

कहाँ जाना है क्यों जाना है

मैं क्यों आया, क्या क्या किया

देख ले जमाना मेरे ईमानदार होने का सबूत जमाना हीं देता

और तुम्हारा छितराई धन दौलत जमा पूंजी बस यहीं तक

रोते बिलखते जाओगें यह तुम्हारा सच !!

रमेश यायावर 17-01-2016

सजना

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सजना – (हिन्दीकविता)

सजना ,सवंरना ,पढ़ना –

और इसी रास्ते गुजरना

यह क्या है धरा का

प्यार ,या मानवीय इजहार

शब्द हंसते अय मानव !

प्रकृति की कितनी समझ तुझे

सत्संगों में तुम्हारा आवरण

भीड़ नही तो और क्या है –

ज्ञान अधुरा मान अधुरा

विज्ञान अधुरा प्रमाण अधुरा

जब – जब मैं भी आता

तुमने पहचाना हीं नही

मुझे चल कर जाना नही

गाथाओं के श्रोत सूखे

जलजलो के पेट भूखे

अब यही अरदास इनकी

सोचता हूँ लाखो भक्त जनन की

पीड़ाओ से घायल हृदय

जिन्हें तुम कहते हो भय

यह उपज भी है तुम्हारी

तुम्हारी ऐसी हीं ,मिलने की तैयारी

मानव नही, समझो निष्प्राण

देखना है धरा पर कौन कौन –

और हैं कितने कितने महान

अंह छोड़ बना पहचान !!

रमेश यायावर 16-01-2016

नजर हिन्दी कविता

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नजर (हिन्दीकविता)

अरे सुनो समय !ये नजरें आजकल बदली बदली सी

जैसे मैंने कभी कुछ किसी को कहा हो

मैंने देखा पुरुष भी घूरते हैं महिलाएं भी घूरती है –

पर, मुझ तक पहुंचना आज भी इतना आसान नही

मैं अपनी दुकान पर बैठा पर तुम्हारी

सात पीढ़ीयों से पकड़ से आज भी बाहर

मेरी नजरे देखती हैं उम्मीदों से मुझसे कुछ कहना

पर तुम्हारा पाप मुझ तक तुम्हें आने ही नही देगा

तुम केवल संसार हो व्यापार हो धरा का प्यार हो

पर मैं अनासक्त निर्मोही निराकार साकार

कितने रूप तुमने देखे हैं अब तलक

द्वादश नाम तो अब भी मेरे

संसार का सार बस एक यही

धर्म की स्थापना कर्म की स्थापना

अपने हिसाब से अपने गणित से

ये विश्व बिरादरी में मारकाट क्या है ?

सोचो जरा ये अंत: करन की सफाई है या नही

यह पाप कर्मो का वह फल है जो तुमने किया था

और तुम कर भी रहे हो ईमान बेचकर

तुम्हारे पास साहित्य है धर्मग्रन्थ हैं

पर तुम इन्हें नही पढ़ते बस भीड़ का हिस्सा बनते

स्वयं बैरागी बनो सन्यासी बनो मोहग्रस्त नही हो

मेरे वचनों की गाथा तुम्हे परिधान बदलने नही कहती

तुम जहाँ हो वहीं बस एक बार रुको अपने अतीत वर्तमान भविष्य को

निहारो फिर चल पड़ो तुम्हे रास्ता मिल जाएगा|

रमेश यायावर 15-01-2016

सुनो 2016 (हिन्दीकविता)

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सुनो 2016 (हिन्दीकविता)

अरे सुनो 2016 !

मैं भी कोई आलसी नही

मेरी भी नींद खुली

जब तुम्हारा मेरे भारत में

आगमन हो रहा था

पटाको की धड़ाम धड़ाम से

मेरी नींद खुली फिर मैं हंसा

तुमने मुझे भी नही बक्शा

मुझे जगा हीं डाला

फिर मैंने टोर्च जलाया

घड़ी देखी, रात के ग्यारह पचास

आखिर मुझसे हो हीं गई मुलाकात

यूँ चुपचाप हीं आते –

सुबह सुबह मुझे मिल जाते

खैर तुमने जगाया है तो

प्रार्थना कर हीं डालूं

हे प्रभु इसे भी आने दें

औरों की तरह गाने दें

यह भी रो पीट कर चला जायेगा

जब जमाने भर की मार खायेगा |

जानें कितने बरस गुजारे हमने

कितनी यादें भुलाई हमने

जीवन एक बरस और घटा

2016 ऐसा सटा !

स्वागतं के दो पल

जीवन से जल्दी निकल !!

रमेश यायावर 01-01-2016