नजर हिन्दी कविता

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नजर (हिन्दीकविता)

अरे सुनो समय !ये नजरें आजकल बदली बदली सी

जैसे मैंने कभी कुछ किसी को कहा हो

मैंने देखा पुरुष भी घूरते हैं महिलाएं भी घूरती है –

पर, मुझ तक पहुंचना आज भी इतना आसान नही

मैं अपनी दुकान पर बैठा पर तुम्हारी

सात पीढ़ीयों से पकड़ से आज भी बाहर

मेरी नजरे देखती हैं उम्मीदों से मुझसे कुछ कहना

पर तुम्हारा पाप मुझ तक तुम्हें आने ही नही देगा

तुम केवल संसार हो व्यापार हो धरा का प्यार हो

पर मैं अनासक्त निर्मोही निराकार साकार

कितने रूप तुमने देखे हैं अब तलक

द्वादश नाम तो अब भी मेरे

संसार का सार बस एक यही

धर्म की स्थापना कर्म की स्थापना

अपने हिसाब से अपने गणित से

ये विश्व बिरादरी में मारकाट क्या है ?

सोचो जरा ये अंत: करन की सफाई है या नही

यह पाप कर्मो का वह फल है जो तुमने किया था

और तुम कर भी रहे हो ईमान बेचकर

तुम्हारे पास साहित्य है धर्मग्रन्थ हैं

पर तुम इन्हें नही पढ़ते बस भीड़ का हिस्सा बनते

स्वयं बैरागी बनो सन्यासी बनो मोहग्रस्त नही हो

मेरे वचनों की गाथा तुम्हे परिधान बदलने नही कहती

तुम जहाँ हो वहीं बस एक बार रुको अपने अतीत वर्तमान भविष्य को

निहारो फिर चल पड़ो तुम्हे रास्ता मिल जाएगा|

रमेश यायावर 15-01-2016

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सुनो 2016 (हिन्दीकविता)

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सुनो 2016 (हिन्दीकविता)

अरे सुनो 2016 !

मैं भी कोई आलसी नही

मेरी भी नींद खुली

जब तुम्हारा मेरे भारत में

आगमन हो रहा था

पटाको की धड़ाम धड़ाम से

मेरी नींद खुली फिर मैं हंसा

तुमने मुझे भी नही बक्शा

मुझे जगा हीं डाला

फिर मैंने टोर्च जलाया

घड़ी देखी, रात के ग्यारह पचास

आखिर मुझसे हो हीं गई मुलाकात

यूँ चुपचाप हीं आते –

सुबह सुबह मुझे मिल जाते

खैर तुमने जगाया है तो

प्रार्थना कर हीं डालूं

हे प्रभु इसे भी आने दें

औरों की तरह गाने दें

यह भी रो पीट कर चला जायेगा

जब जमाने भर की मार खायेगा |

जानें कितने बरस गुजारे हमने

कितनी यादें भुलाई हमने

जीवन एक बरस और घटा

2016 ऐसा सटा !

स्वागतं के दो पल

जीवन से जल्दी निकल !!

रमेश यायावर 01-01-2016

स्वामी (हिंदी कविता)

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स्वामी (हिंदी कविता)

क्या तलाश है तुम्हें किसी स्वामी की

पर क्यों , तुम भी तो स्वामी हो –

अपने घर के अपने व्यवसाय के

तुम्हे किसी और स्वामी को खोजना नही

बल्कि स्वयं अपनी साधना से स्वामी बनना है

और खोजना है तुम्हें अपना”रामकृष्ण परमहंस”

वह भी नरेंद्र हो कर फिर बनोगे तुम स्वामी विवेकानन्द

नवीन संरचना के साथ नवीन परिधानों में

एक नही हजारो भटक रहें हैं लाखो भटक भी गये हैं

अपने बिम्ब को प्रतिबिम्ब को पहचानो

क्यों आए और क्या क्या पाए इस धरा पर

पावन पूण्य यह धरती आज भी है

इसपर बसे मानव हीं इसे नक्कारते हैं

तुम छोडो इन बातो को तुम भी नरेंद्र हो

पहचानो अपने आपको यह साधना कोई

एक दो बर्षीय नही बल्कि जीवन समूल

इसी खोज में समर्पित करो होम करो जीवन

तब तुम्हारा राम कृष्ण परमहंस मिलेगा

ये तीन हैं या एक तुम अपनी खोज में बताना |

रमेश यायावर , बनमनखी ! 27-12-2015

यथार्थ (हिन्दीकविता)

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यथार्थ (हिन्दीकविता)

थोड़ी सी बची मेरी जिन्दगी

तुम्हें कितना हिसाब किताब दूँ

मैंने कहा मैं मनुष्य नही –

तुमने माना नही ,पहचाना नही

शब्दों के भंवर जाल मैं नही फंसता

हर बात को समझने का मेरा प्रयास

नजरे चुराने, नजरे मिलाने का है

जबरन मिलाये तो भी दोषी

हृदयाघात चाहे जितना हो कोशी |

सच में बाहर झाँकने की ताकत होती है

तुम्हारे दिल के तहखाने में इसी जमाने में

मैं झूठ नही बोलता मेरी कविता के यथार्थ –

आज यही हैं, तुम चोर हो !

तुमने भारत देश का धन चुराया है

मेरा मन चुराया है मैं तुम्हें माफ़ नही करता

मेरे मन के थानेदार ने जब जाँच की

सच छिपाने की कवायद हीं आज इसे माना

अब देखना ईश्वर के विधान का सच

तुम दंडित होते हो या नही

सच जरुर बाहर निकलेगा

बिना दंड भोगे कोई मरता हीं नही

तुम भी दंड भोगे बिना मरोगे नही

रमेश यायावर 17-12-2015

जज्बात हिन्दी कविता

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जज्बात (हिंदी कविता)

जज्बातों का ठिठकना ,रुकना

फिर चलना क्या तुम्हें मंजूर था कभी

पर, वक्त ने किसी गन्ने की तरह निचोड़ डाला

और अब सूखे गन्ने से भी खाना पकता है

तुम्हें मालूम है तुम हीं पेट भरते हो

तुम्हारा अस्तिव क्या है ?

तुम्हारे ईश्वर प्रदत जज्बात बस इसी को

सब याद करते हैं एक दुसरे से कहते हैं

शब्द हीं ब्रह्म हीं यूँ हीं नही कहा गया

जब तुमसे रहा नही गया तुम फिर प्रगट हुए

यह दुनियां बस इतना जानती है,

कुछ आदमी मरने के बाद अमर होते

कुछ जीवन यूँ हीं पशुओं की तरह ढ़ोते

मानवीय पीड़ा उकेरता मन

कातिलो ने सारी धरती रौंद डाली

तुम क्या जानो यह धरा अब खाली खाली है

अब ना यहाँ हरियाली है और नही यहाँ पर लाली है |

छाता है रोज घुप अँधेरा फिर हवा प्रदूषित

और तुम लिखो जज्बातों के गीत !

रमेश यायावर , बनमनखी !

पहचान नदी की

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पहचान नदी की (हिंदी कविता)

गहराती नदी उदासी नदी

इतराती नदी प्यासी नदी

जो निकलती तो है, झरने की खोज में

अपनी हीं मौज में, पर मिलती है उसे मौत !

फिर कोई नही पूछता कोई नही ढूंढता,

कोई नही खोजता यही तो जमाना है –

काम निकला और पहचान गायब |

खुद हीं खुद को मिटा गई

समुन्दर में समा गई

पहचान मिटी तो बनी बात

यही हैं शब्दों भावों के जज्बात

आना जाना नियति है |

पर जमाने के खोखले शब्द

गीले होकर भी मेरे गले नही उतरते

क्योकिं मैं नदी हूँ वही यायावर नदी

जो प्यारे भारत से बहती हूँ अमेरिका से कहती हूँ-

सफाई हीं जीवन है और गन्दगी है मौत

तुमने आतंकी पाले हैं या अपनी हीं सौत ?

गन्दगी करो नही किसी से डरो नही

हर नदी समुन्दर से हीं मिलती है

और वहीं से धरा पर फिर आकर खिलती है

फिर शहर शहर कचरा करते

आ पहुंचे हैं मुझमें मरते मरते

मैं नदी हूँ मैं बंधी हूँ ,माँ के आंचल से –

जहाँ दिनरात बरसता आकाश पिता का प्यार

शुद्ध हवा साफ रोशनी हीं मेरी दवा है |

मैं गवाह हूँ रोटी बिलखती आसूं छलकाती नदी हूँ | रमेश यायावर , बनमनखी ! 07-12-2015

लड़की हिन्दी कविता

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लड़की (हिंदी कविता)

जमाने में तुम्हीं तो एक लड़की हो

सुबह सुबह हीं कहाँ से धडकी हो

बार बार जमाने पर हंसती

मुझे लगा जमाने में फंसती

कानो में लगाकर ईयर फोन

हालात देखकर मैं रह ना सका मौन ?

जमाने ने क्या तुम्हे यही तहजीब सिखाई

तुम्हीं जमाने में क्या अकेली आई

माँ बाप ने कैसे कैसे दिए संस्कार

सड़क पर टहलना क्या तुम्हारा यह अधिकार

बातचीत के बहाने मन तुम्हारा नही माने

रात तो तुमने किस कदर बिताई

सुबह सुबह घर से निकल कर बाहर आई

यही जमाने से खीज बड़ी है

तुम क्या जानो टीस बड़ी है

मेरी कोई नही फिर भी मैं रोता हूँ

जमाना मुझको मैं जमाने को ढ़ोता हूँ ||

रमेश यायावर , बनमनखी !