एक अदद चाय

मानक

एक अदद चाय (हिन्दीकविता)

एक अदद चाय ने

आज ने सिर फोड़ा

जमाना काला है या गोरा

सोचने को विवश हुआ

मैं पैदल था, आज बस हुआ

वर्ड प्रेस की छपी एक कविता

से मैंने भी लिखने की ठानी

नही लिखूं तो होगी बईमानी

पहरावे को देखकर हर कोई था दंग

देखता कोई और भी है क्या संग

ये चाय की केतली उठाए

चौराहे पर खडी ,क्या कब कहाँ हुई बड़ी

किसी को चाय पीने में संकोच

किसी की बदल रही थी सोच

निहारता हर कोई तालाब में फूल खिले

कब कैसे इससे मिले ?

सबकी नजरे बस पहचान रही थी

ये कौन कहाँ की खान रही है

कुछ कसर लिबास ने छोडी

कुछ कदम ताल से थी गोरी !

चाय पीने से बढ़ेगा चाय का नशा

अब मानव मानवता में कहाँ बसा ?

घूरती निगाहों में बस केतली और चाय

देखता था आदम जात कितनी होगी आय

ये कहे घर ले चलूं और घर ले जाकर इसे छ्लूं !

रमेश यायावर 20-01-2016 ( वर्ड प्रेस की छपी कविता और चित्र देखकर निकला काब्य )

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