मन की बात (हिन्दी कविता)

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मन की बात (हिन्दी कविता)

बुंदा बांदी के बीच अपने प्रतिष्ठान में

चुपचाप उदासीन मन से अकेला बैठा था

हवाओं का शोर ऐसे बह रहा था –

जाने कुछ मुझसे कह रहा था

मुंह चिढ़ाऊ जैसे अकेलापन ,होता क्या है वन वन !

और हर दिन हर मानव का होता खास

अपने जन्म दिन से कैसी आस!

क्या कोई पैगाम मिलेगा या कोई नवीनतम इंतजाम मिलेगा |

रोज की तरह सूरज निकल कर डूब जायेगा

तुम क्या रोटी कपड़ा और खायेगा?

21 सितम्बर को आया मेरा जन्म दिन

जैसे आया हो दिन गिन गिन !

वक्त के फंदे ने हाथ पांव बांध डाला मैं गोरा था काला

मानव चाहे कितने तेज अब तो राघव मुझतक भेज

हर कोशिश के व्यंग बाण कह रहे थे सीना तान

जीवन से आज एक दिन और घटा क्या कोई अब तक अंग कटा

दिन निकला तो फिर रात हुई मन से मन की बात हुई

प्रश्न छंटे और स्वप्न में हंसे मन ने मन की मांग भरी

उमंगे ,अनुभव ,यादें स्मृतियाँ हुईं और बड़ी

देखा समय तो सुबह के पांच बजे थे

मन के दीपक मन हीं मन सजे थे

उठे जगे और तैयार हुए तुम क्या जानो बेकार हुए

पल पल जो करता सदा निहाल में था उस प्रभु का लाल !

जब सब सोते तो वह जगता था मन के दरवाजे में बहता था

उसकी लीला अपरम्पार मन की बात से कविता हुई तैयार !!

आपका रमेश यायावर , उर्फ़ रमेश अग्रवाल बनमनखी, पुर्णियां, बिहार| )

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