जन्नत में माँ ( विनम्र श्रधांजली )

मानक

जन्नत में माँ ( विनम्र श्रधांजली )

ओ माँ ! ओ माँ !

मैं भी, आ गया माँ

देख मुझे मेरा शरीर

जीर्ण शीर्ण हो गया माँ –

बाल मेरे सफेद हो गये

शरीर भले हीं साथ ना दें

पर, मन मेरा जवां है माँ |

तुमसे बिछड़े दशको हो गये

तुम्हे मेरी याद नही आई

ओ माँ ! ओ माँ !

अब लो , मैं खुद हीं चलकर

आ गया माँ !

अब अपने आंचल का प्यार देना माँ

कुछ इस तरह जन्नत में

कलाम सर खोज रहे माँ !

पर, वहां तो प्रकृति के आंचल में एक बार फिर

माँ लौटाई जा चुकी थी और –

माँ को ढूंढते ढूंढते कलाम साहब ने

दो दिन और एक रात निकाल डाली जन्नत में

और जब सपुर्दे ए खाक होते हीं कल गुरुवार

30 जुलाई 2015 वे वतन की जमीं से लिपट

रो पड़ेगें , और हमें इस तरह राष्ट्र पिता के साथ साथ

राष्ट्रपति की प्राप्ति हो जायेगी जो सदा सदा के लिए होगी | |

( डॉ कलाम साहब को मेरी विनम्र श्रधांजली समुद्र के जल के साथ , गंगा जल के साथ , फूलो के साथ काव्य पुष्पों के साथ आपका रमेश यायावर , उर्फ़ रमेश अग्रवाल बनमनखी, पुर्णियां, बिहार| )

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s