मेरी रेल यात्रा

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मेरी रेल यात्रा
जीवन की कोई पहली रेल यात्रा नही थी ,पर कुछेक बिन्दुओं ने मेरे मन को छुआ तो मैंने रेल यात्रा प्रसंग को लिखने का मन बना लिया | सर्वप्रथम मै रेल विभाग की भलमानसता को धन्यवाद देता हूँ जिसने आज मुझे अपनी बात लिखने के लिए इस प्लेटफोर्म तक मुझे घसीट लाया | कुछ अच्छाईयों और कुछ बुराइयाँ आज भी रेल यात्राओं में अनुभव होता है | जब कहीं 12 घंटे की यात्रा का कार्यक्रम रहता है तो नेवाले साथ रहते हैं , पर प्लेटफोर्म पर कदम पड़ते हीं मेरी मरी भूख जागृत हो उठती है | मन होता है कोई एकांत देखकर इससे निपट लूँ अन्यथा रेल डिब्बे में पता नही कितनी भीड़ जबरन बैठी मिले और उनके उतरने के इंतजार में रात काली नही करनी पड़े | साथ हीं दो रोटी घर पर एक समय के भोजन में करता हूँ पर रेल यात्रा में भूख लगती है दो के बदले चार चपाती चट कर जाता हूँ कहीं रेल डिब्बे में खाने के संकोच के चलते भोजन प्रसाद पड़ा नही रह जाए | पर इस बार छह बजे स्टेशन पहुंच गया ट्रेन 7 बजे थी ,गाड़ी आते हीं अपनी सीट को निहारा जैसे वो मेरे आने का इंतजार कर रही हो, और बैठते हीं भिन्न भिन्न मतो को समझने वाले ज्ञान पुरुषो को प्रवचनों को चुपचाप सुनता रहा ,बेकार इनके उपदेशो में जरा सी कटाई सफाई हो गई तो बात का बतंगड इसलिए मूर्खो की तरह मौन रहना सबसे बेहतर उपाय मैंने एस क्रम को माना | इसी टीटी बाबु का आगमन हो जाता है पर वे टिकट जाँच करते | इंटरनेट से बनी टिकट वालो से परिचय पत्र भी मांगते |एक बडबोले महोदय ने यहाँ तक कह दिया वोटर कार्ड ,पेनकार्ड ,आधार कार्ड सभी हैं | टी टी भी हाजिर जबाबी था बोला सारे नही कोई एक दिखाएँ तो उस भल मानुष की बुद्धि गुम अब उसने खोजने की कोशिश की और देखकर टी टी बाबु आगे बढ़ लिए | फिर अपने अपने भोजन का पैकट सबने निकला | कोई अमीर सुखी रोटी खा रहा था और कोई गरीब आराम से मेरी तरह “ अन्नपूर्णा सदा पूर्णा शंकर प्राण बल्ल्भे ज्ञान बैराग्य सिद्धर्थम भिक्षां देही च माता पार्वती “| आराम से आचार चपाती सुखी सब्जी कहा रहा था और अमीरों पर हंस रहा था सारा ज्ञान तो तुम्हारी रोटी बता रही है तुम कितने संयमी पुरुष हो और नीरोगता तो रोटी बता रही थी कई इतना हीं सुख तकदीर में लिखा है | फिर आराम करने के लिए चादर शरीर पर डाल ली मेरी आँख भी लग गई | सुबह चार बजते है नित्य क्रिया से निवृत हुआ अब बंगाल राज्य के आबो हवा हृदय से टकराने लगी | गाड़ी रुकते ही माँगनेवालों ज्यादातर आलसी बस मांग कर ही अपना गुजारा करते और पैसे बटोरकर फिर उसी डिब्बे की खाली पड़ी सीट पर आराम फरमाते | आगे तीसरे जेंडर का धमाल शुरू हो गया जबरन सोये यात्रीयों को जगाकर पैसे मांगे जाते मेरी तो इनकी हरकतों पर निगाह थी हीं मैंने एक दस का नोट आते हीं थमा दिया अन्यथा गालो और कंधो को छूकर इनका ब्यवहार शुरू होता और पैसे नही देने वालो को ये गलियां देते पता नही रेल पुलिस इन हरकतों से अंजान क्यों बनी रहती है वो भी चार चार जन पुरे डिब्बे पुरी गाड़ी में हरकत करते हैं इन्हे कोई रोकता नही पूर्व में भी मै इन यात्राओ में गया था तब भी यही नाटक था आज भी है | सरकार बंगाल में और सेंट्रल में भी बदल गई पर इनका आतंक कभी कम ना हुआ ओए इसी तरह साढ़े आठ बजे कोलकाता पहुंचा |

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