पुलिस की कार्य शाली (मेरी कहानी) व्यंग

मानक

पुलिस की कार्य शाली (मेरी कहानी) व्यंग

नोट – कुछ पुलिस की कार्यशैली से उपजा व्यंग

एक लड़का दुर्घटनाग्रस्त सड़क पर गिरा पड़ा था जैसे ताजा शिकार हीं अभी अभी हीं हुआ हो और शिकारी ,गाडी लेकर फरार हुआ हो , दूसरा लड़का उसी रास्ते से जा रहा था और दुर्घटनाग्रस्त लड़के को देखते हीं अपनी आदतों के अनुसार कहा, रास्तो पर मरे पड़े हो! अब तो घर जाकर पहले नहाना पड़ेगा | और फिर घायल की श्वासों को जांचने हेतु दुर्घटनाग्रस्त लड़के छाती पर हाथ रखा , और जोर से बोला अरे! इसकी तो श्वासें चल रही है | एन मौके पर पुलिस पहुंची और देखते हीं बोली क्या मतलब तुम्हारा श्वासें चल रही है | नही साहब मैंने समझा जीवित हो तो अस्पताल पहुँचा दूँ , अस्पताल क्या तुम्हारे बाप का है नही! नही! चलो थाने और घायल को लेकर पहले थाने पहुंचे | फिर वही सवाल दागा किसने मारा इसे सच सच बता नही तो पुलिस तुम्हारे बाप से भी सच उगलवा लेगी | साहेब बाप को मरे तो छह साल हो गये तो क्या हुआ सच तो हम उगलवा कर हीं रहेगे | पहले बता बाप को किसने मारा नही नही मैंने नही मारा अपने आप बीमारी से मरा था | ओह बाप को तो अस्पताल नही ले गये और लोगों को अस्पताल पहुँचाने का ठेका लिया है क्या ? नही मै तो दाना लाने जा रहा था उस रास्ते पर यह गिरा पड़ा था | थाना को दाना कौन देगा मुंशीजी इस लड़के का केश बनाओ मुंशी भी टक्कलस बोला देखकर आता हूँ नाई आया है या नही अरे नही इसका पिता छह बर्ष पहले मरा इसने थाने को खबर नही की | लड़का घबराया मेरी माँ अकेली है , दरोगा ने मूंछ पर ताव फेरा जमीन कितनी है कई हाथ है साहेब लड़के ने जबाब दिया मतलब जमीन में कई हाथ दबाया है यह तो पक्का बदमाश है क्या नाम है तुम्हारा मुछेन्द्र नाथ , मुछे तो तुम्हारी आई नही फिर मुछेन्द्र्नाथ किसने नाम रखा तुम्हारा | साहेब माँ ने रखा था दरोगा रौब दिखाता हुआ तुम्हारी माँ से मिलना तो पड़ेगा उसने यह नाम क्यों रखा है यह नाम तो मेरा है और सायं काल आवाज लगाई ओ मुछेन्द्र्नाथ माँ आई तो पुलिस की वही कार्यशैली तुम्हारे बेटे ने जख्मी कर दिया है और घायल थाने में पड़ा है तुम्हारा बेटा जेल में बंद है हम तहकीकात करने आये हैं तुम कुछ खर्च वर्च करो तो हम कोशिश बड़े साहेब से कहकर छुड़वा देंगे इस प्रकार पुलिस को दौहरे चरित्र को अब कहने की आवश्यकता नही है पुलिस वहां क्यूँ गई और आगे क्या किया !

(काल्पनिक बातो और समाज में बिखरे पुलिस के बहुरूप पर आधारित एक कोशिश |

रमेश अग्रवाल / रमेश यायावर 12 -06 – 2015

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