हिंदी कविता

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हिंदी कविता

गर्मी लू के थपेड़ों से कुछ जीव जन्तु |

मनुष्य पेड़ पौधे अब किनारे हो गये ||

जो बचे अब वे भी मारे मारे हो गये |

कुछ खुद हीं, खुदा को प्यारे हो गये ||

अब अंधरे भी, धरती से किनारे हो गये |

यह बदला था बादल सब बेचारे हो गये ||

धरती पर जो हरे थे वे अब हारे हो गये |

धरती पर जो पीले थे वे सब प्यारे हो गये ||

इस तपन से करोड़ों के वारे न्यारे हो गये |

जो समझे जब इस जग को बस पारे हो गये ||

बेवशी के जंवा आंसू अब कुंवारे हो गये |

हमने समझा जब तुमको बस तुम्हारे हो गये ||

जो न समझे थे हमको वे भी हमारे हो गये |

जो न समझे थे हमको वे भी हमारे हो गये ||

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