साँपों का भय (मेरी कहानी)

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साँपों का भय (मेरी कहानी)

‘मुझे मौत का भय नही होता पर यह मौत तो स्वभाविक हो !’ दुर्घटनावश मौत को मै जिन्दगी का अधुरा सफर मानता हूँ | संसार में सांपो का भय सारे मनुष्यों को होता है मुझे भी है| पर मेरे, जीवन में कुछ घटनाएँ ऐसी घटी अब मुझे साँपों का भय कम होता है | जबकि कई बार पढ़ा सारे सांप विषेले नही होते पर यह ज्ञान साधारण मनुष्य को कहाँ से होगा ? ये सांप सांप सुनते हीं लोगो के प्राण उपर नीचे होने लगते है | फिर पहचान तो संपेरो को या फिर इसके सर्प विशेषज्ञ को होगी |बात 1986 की है मै विरक्त जीवन में प्रवेश की तैयारी कर रहा था | पंजाब के नंगल डैम शहर में पूरब पहाडी पर एक जालफा माता रानी का छोटा मंदिर है | मै वहां महंत जी के पास था वे अकेले रहा करते थे कोई शिष्य उनके पास नही था या उन्होंने शिष्य नही बनाया था मंदिर के नीचे दो कमरे थे जहाँ एक कमरे में आगन्तुक साधू संत रुकते और दुसरे में भोजन प्रसाद आदि बनते | मै भी वहीं सोया करता आसन्न वही सवा हाथ चौड़ाई में कटा कम्बल | मै अपने आसन्न पर बैठा हीं था थोडा मन्त्र जप कर सोऊंगा | संयोगवश सांयकाल एक साधू सन्यासी वहां आया था वह अपने आसन्न पर विराजमान था और सन्यास जीवन पर मुझसे चर्चा कर रहा था| उस कमरे में प्रवेश का एक हीं मार्ग था , एक गेट और था उससे हवा आदि के खोला जाता था पर उससे उतरने की सीढीयाँ नही थी पहाडी ढलान पर उतरा जा सकता था | प्रवेशद्वार से एक करीब तीन हाथ लम्बा एक सर्प प्रवेश किया दोनों के प्राण संकट में थे | मै अपने आसन्न पर बैठा रहा जो करेगा सर्प करेगा मै क्या कर सकता हूँ | और वह सर्प किधर गया या दुसरे दरवाजे से नीचे उतर गया या रसोईघर में गया मुझे नही पता, कोई दरवाजा अलग से उस कमरे में नही था | अब साधू सन्यासी के प्राण पखेरू उड़ते उड़ते बचे वह बोला रात हो गई पहाडी से अंधरे में नीचे उतरा नही जा सकता इस कमरे में मै सो नही सकता और अन्तत वह उपर मंदिर के पास सोया और सुबह होते हीं भाग लिया वहां से | मै उस कमरे में डटा रहा मुझे क्या सांप काट खाय या भगवान भोले नाथ हमारी खोज खबर लेने स्वयं आए हो इस प्रकार सांपो का भय पहली बार जीवन में थोडा कम हुआ |

रमेश अग्रवाल / रमेश यायावर

30 -03 – 2015

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