महफिल (कविता)

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   महफिल (कविता)

गुजरे जमाने की महफ़िलो में

दिल रहा करता था फिल्मो में

एक प्यार का पैगाम मेरा भी –

रह गया अंत:करन की मंजीलों में

मैंने ना धोखा दिया ना धोखा खाया

मै धरा पर यूँ हीं नही आया भाया!

मेरी कहानी ना पुरी ना अधूरी

अंत:करन की प्रेरणा मेरी मजबूरी

अपनी खुदी मंजील की तलाश में

मै भी बह गया बस प्यास में

शागिर्दी भी कोई छोटी नही

क्या मेरे नाल रोटी नही ?

हे परवरदीगार मै ‘ विशाल’

यह क्या हमारा हाल

तीर्थो की खाक छानी

संतो की राख वाणी

चला अकेला ,अलबेला

मिली मौज मन का मैला

अंत:करन के पट भी खुलते

नदी नालो के सत्य भी मिलते

वो है इधर किधर

वन वन फिरता है नाले “श्री धर”!

रमेश यायावर 14-02-2015

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