फूलो से बच्चे

मानक

फूलो से बच्चे
कई फूलो की तरह
कई झूलो की तरह
झूमते थे बगीया में
उन्हें क्या पता –
वे मासूम ठहरे
कब्र हीं मिलेगी
यहाँ, नसीब को
ये स्कूली भवन हीं
कत्ले आम का गवाह बन
मूक बधिर- सा
रक्त की चादर ओढ़ कर
गोलियों की दंश झेलगा
फिर ताबूत बन
बुझे दीये 132 मिले –
माँ के नसीब को |
कहीं चीत्कार से
दहाड़ से जलता है
बुझा दिया दीया
दीये से जब बाती निकली
फिर निकला, रक्त सा तेल
मानव हो तो मानव समझे
यही बदनसीबी का खेल |
रक्त कलम से पंक्ति लिखी
वही चिठ्ठी भी अंतिम लिखी
बच्चो की चीखे साथ चली थी
हर मासूम ने आँखे मली थी
फिर तड़ातड़ तड़ातड़ तड़ातड़
भूने गए , धरती से चुने गए
जो मिटे हैं छोटे लाल
सारी धरती को हुआ मलाल |
“ जो कलम की धार बन गए
मासूमो से तलवार बन गए
तुम क्या जानो हार बन गए
सारी दुनियाँ का प्यार बन गए || ” रमेश यायावर 17-12-14

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