कहानी (कविता)

मानक

कहानी (कविता)
ये कहानी ना
ढूढ पायेगी तुम्हें !
ये जवानी ना –
ढूढ पायेगी तुम्हें!
ये हजारो की मंजिल
ये किनारों की मंजिल
ये बहारो की कविता
और फिर महफिल –
के सफर में,
अकेला आदमी
कल भी था
आज भी है
मेरी हीं तरह …|
अनायास कोई मिले तो
अनायास कोई खिले तो
फिर रिश्तो के बंधन
क्या कोई बंधन है ?
एक सडक के सफर में
नदी आ हीं मिलती है
और नदी से निकलते हीं
फिर पहाड़ों पर चढना
यही तो जिन्दगी है
इस ऊंचाई के जंग में
हर आदमी आज भी
उतना बौना है |
सिर्फ, लम्बाई लिए
हर कहानी में पिस्ता
जुबां से हीं घिसता
छाले जब पड़े हों
बस आ खड़े हों
यह देश तुम्हारा है
मै मुसाफिर जो ठहरा
मै मुसाफिर ……….!
रमेश यायावर ०8-12-14

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