आदमी (कविता)

मानक

आदमी (कविता)
रिश्तो में गढ़ा आदमी
क्यों कहते हो पढ़ा आदमी
आधा जमाना मुर्ख है और –
आधा रिश्तो से , सुर्ख है |
कटे होठो से लाली –सी बात
उकेरता है जमाना
सारे हीं जज्बात |
मिथक टूटे नही कभी ,
आदमी हीं टूट जाता है
जमाना हीं जानता है
जमाना अबतलक
क्या क्या खाता है |
हर खानाबदोश शहर में
अब गावों को खोजते हैं
जब हवा भी दूषित हो
वहाँ शुद्ध पानी –
क्या खोजते है |
चाह ने उलझाया है
जबसे यहाँ जीवन
आदमी तो गंदा है
पर कुछ लोग , अच्छे !
अब तलक तो पाया है
जब कमीज का कुर्ता
पहना हो आदमी
सर को झुकाओ
और चल पड़ो सफर पर
मै अकेला हीं चला हूँ ,
अब लोग मिल रहे है
अबतलक जो साथ थे
वे अब हिल रहे हैं |
रमेश यायावर ०8-12-14

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