तकदीर कविता

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तकदीर कविता
तुमने लिखी कहीं
जो तकदीर मेरी
क्या मै धरा का
आदमी हीं नही ?
रोता विलखता बस
चल रहा अकेला
क्या मै धरा का
आदमी हीं नही ?
बन्धु बांधव सारे
मरे हैं मेरे
क्या मै धरा का
आदमी हीं नही ?
कट कट जो गए हैं
रट रट जो बहे हैं
क्या मै धरा का
आदमी हीं नही ?
रोज चीखता चिल्लाता
कोई आता न जाता
क्या मै धरा का
आदमी हीं नही ?
मरा भी नही हूँ
मारा भी नही हूँ
क्या मै धरा का
आदमी हीं नही ?
सुनते हो सबकी
करते हो मन की
क्या मै धरा का
आदमी हीं नही ?
क्या मै धरा का
आदमी हीं नही !!
रमेश यायावर ०7-12-14

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