कविता -17 (गीत)

मानक

कविता -17 (गीत)

इस जीवन को तू देख जड़ा

इस जीवन ने क्या क्या पाया है,

जब भी देखूं नील गगन को

यह कैसा अँधेरा छाया है

इस जीवन को……………|

विश्व क्षितिज को अपना मानू

मन ने यही तो गाया है ,

वन भी तू है मन भी तू है

फिर क्यो, इतना तपाया है

इस जीवन को……………|

दुनियाँ बदली मन ना बदला

ऐसा हीं यह साया है

कहते रहे सब जग वाले

धन सम्पदा हीं तो माया है

इस जीवन को……………|

बचपन बीता यही तो गीता

कर्म करने हीं तो आया है

सुन्दर रचना सबसे बचना

गई जवानी लाया है

इस जीवन को……………|

 रमेश यायावर

13-10-14

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